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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी समुदाय का अपमान करना स्वीकार्य नहीं- सुप्रीम कोर्ट

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी समुदाय का अपमान करना स्वीकार्य नहीं- सुप्रीम कोर्ट

घूसखोर पंडित विवाद पर सुनवाई, शीर्षक बदलने के बाद मामला खत्म  

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी समुदाय का अपमान या उसे बदनाम करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि भाषण, मीम, कार्टून या किसी भी प्रकार की दृश्य कला के जरिए किसी वर्ग को नीचा दिखाना संविधान की भावना के खिलाफ है।

यह टिप्पणी घूसखोर पंडत फिल्म के शीर्षक को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने अपने अलग मत में कहा कि विशेष रूप से संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को अधिक जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए और धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाना संविधान का उल्लंघन है।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति भुइयां और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने की। निर्माताओं द्वारा फिल्म का शीर्षक बदलने के बाद अदालत ने मामले का निस्तारण कर दिया। हालांकि औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं थी, फिर भी अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं भी तय हैं और बंधुता का सिद्धांत सर्वोपरि है।

इस दौरान अदालत ने हाल के विवादों का भी अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख किया, जिनमें हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़ा मामला भी शामिल है। शीर्ष अदालत पहले ही इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार करते हुए पक्षकारों को उच्च न्यायालय जाने की सलाह दे चुकी है।

अदालत ने दो टूक कहा कि किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित करना असंवैधानिक है और यह सिद्धांत खास तौर पर उन लोगों पर लागू होता है जो सार्वजनिक पदों पर रहते हुए संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं।

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